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युगऋषि का संदेश

अंग-अवयवों से अपेक्षा

परम पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा अपने नैष्ठिक कार्यकर्ताओं एवं समर्पित शिष्यों को दिए गए दिव्य निर्देश।

परम पूज्य गुरुदेव के निर्देश

परम पूज्य गुरुदेव द्वारा सूक्ष्मीकरण के बाद दिये गये वे महत्त्वपूर्ण निर्देश, जो हर लोकसेवी कार्यकर्ता, समयदानी और समर्पित शिष्य पर लागू होते हैं, जिसमें उन्होंने यह अनुरोध किया है कि वे अपना चिन्तन और जीवन शैली कैसी रखें।

  • कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी: यह मनोभाव हमारी तीन उँगलियाँ मिलकर लिख रही हैं पर किसी को यह नहीं समझना चाहिए कि जो योजना बन रही है और कार्यान्वित हो रही है, उसे प्रस्तुत कलम, कागज या उँगलियाँ ही पूरा करेंगी। इसे करने की वास्तविक जिम्मेदारी आप लोगों की, हमारे नैष्ठिक कार्यकर्ताओं की है।
  • दैवी सत्ता की सक्रियता: इस विशालकाय योजना में प्रेरणा ऊपर वाले ने दी है। कोई दिव्य सत्ता लिखवा रही है। मात्र लिखने वाली उँगलियाँ न रहें या कागज-कलम चुक जाएँ, तो भी कार्य रुकेगा नहीं; क्योंकि रक्त का प्रत्येक कण और मस्तिष्क का प्रत्येक अणु उसके पीछे काम कर रहा है और वह दैवी सत्ता भी सतत सक्रिय है।
  • अंग-अवयवों का महायोगदान: प्रस्तुत योजना को कई बार पढ़ें। इस दृष्टि से कि इसमें सबसे बड़ा योगदान उन्हीं का होगा, जो इन दिनों हमारे कलेवर के अंग-अवयव बनकर रह रहे हैं। आप सबकी समन्वित शक्ति का नाम ही वह सत्ता है, जो इन पंक्तियों को लिख रहा है।
  • "योजना बड़ी है। उतनी ही बड़ी, जितना कि बड़ा उसका नाम है- 'युग परिवर्तन'। इसके लिए अनेक वरिष्ठों का महान् योगदान लगना है। उसका श्रेय संयोगवश किसी को भी क्यों न मिले।"
  • साधनों की चिंता से मुक्ति: कार्य कैसे पूरा होगा? इतने साधन कहाँ से आएँगे? इसकी चिन्ता आप न करें। जिसने करने के लिए कहा है, वही उसके साधन भी जुटायेगा। आप तो सिर्फ एक बात सोचें कि अधिकाधिक श्रम व समर्पण करने में एक दूसरे में कौन अग्रणी रहा?
  • हनुमान जैसा पूर्ण समर्पण: साधन, योग्यता, शिक्षा आदि की दृष्टि से हनुमान् उस समुदाय में अकिंचन थे। उनका भूतकाल भगोड़े सुग्रीव की नौकरी करने में बीता था, पर जब महती शक्ति के साथ सच्चे मन और पूर्ण समर्पण के साथ लग गए; तो लंका दहन, समुद्र छलांगने और पर्वत उखाड़ने का श्रेय उन्हें ही मिला। अपेक्षा है कि कोई भी परिजन हनुमान् से कम स्तर का न हो और कर्तृत्व में पीछे न रहे।
  • निरंतर बढ़ता समर्पण भाव: काम क्या करना पड़ेगा? यह निर्देश और परामर्श समय-समय पर मिलता रहेगा। आप लोग तो सिर्फ एक बात स्मरण रखें कि जिस समर्पण भाव को लेकर जुड़े थे, उसमें दिनों-दिन बढ़ोत्तरी होती रहे, कहीं राई-रत्ती भी कमी न पड़ने पाये।
  • स्वयंसेवक बनने का गौरव: लक्ष्य तक निशाना न पहुँचे, तो भी वह उस स्थान तक अवश्य पहुँचेगा, जिसे अद्भुत, अनुपम, असाधारण और ऐतिहासिक कहा जा सके। अपने श्रम, समय, गुण-कर्म और स्वभाव में कहीं भी कोई त्रुटि न रहे। विश्राम की न सोचें, स्वयं को विनम्र मानकर स्वयंसेवक बनने में गौरव अनुभव करें।
  • अहंकाररहित पुरुषार्थ: अपनी थकान और सुविधा की बात न सोचें। जो कर गुजरें, उसका अहंकार न करें। हमारा चिंतन, मनोयोग एवं श्रम कितनी अधिक ऊँची भूमिका निभा सका, यही आपकी अग्नि परीक्षा है। अपने साथियों की श्रद्धा व क्षमता घटने न दें, उसे दिन दूनी-रात चौगुनी करते रहें।
  • मिशन के लिए ऊँचे दर्जे की तत्परता: स्मरण रखें कि मिशन का काम अगले दिनों बहुत बढ़ेगा। इसके लिए आपकी तत्परता ऐसी होनी चाहिए, जिसे ऊँचे से ऊँचे दर्जे की कहा जा सके और प्रेरक सत्ता आपको अपने अत्यंत घनिष्ठ सहचर के रूप में स्वीकार करे।
  • १०
    नित्य आत्म-समीक्षा: कहने का सारांश इतना ही है कि आप नित्य अपनी अन्तरात्मा से पूछें कि जो हम कर सकते थे, उसमें कहीं राई-रत्ती त्रुटि तो नहीं रही? आलस्य-प्रमाद को क्रिया-कलापों में घुसने का अवसर तो नहीं मिला? अनुशासन में व्यतिरेक या अहंता छद्म रूप में आप पर सवार तो नहीं हो गयी?
  • ११
    अग्नि परीक्षा और व्यक्तित्व की ऊँचाई: यह विराट् योजना पूरी होकर रहेगी। देखना इतना भर है कि इस वेला में आपका व्यवहार गड़बड़ाया तो नहीं। कोई लम्बाई से ऊँचा नहीं होता; श्रम, मनोयोग, त्याग और निरहंकारिता ही किसी को ऊँचा बनाती है। इस विषम वेला में कोई पिछड़ने न पाए।

मुख्य जीवन सिद्धांत

हनुमान जैसा समर्पण

अकिंचन परिस्थिति में भी महती शक्ति के साथ लगकर पूर्ण समर्पण और सेवा का आदर्श प्रस्तुत करना।

निरंतर तत्परता

विश्राम की बात न सोचकर, आलस्य-प्रमाद को दूर रखकर अहर्निश मिशन के कार्यों में सक्रिय रहना।

विनम्रता व निरहंकारिता

स्वयं को विनम्र मानकर स्वयंसेवक बनने में गौरव अनुभव करना और दूसरों को बड़ा मानना।

आत्म-समीक्षा

नित्य अन्तरात्मा से पूछना कि कर्तव्यों के पालन में कहीं कोई राई-रत्ती त्रुटि तो नहीं रही।

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