उज्ज्वल भविष्य के द्रष्टा
इतिहास में कभी-कभी ऐसा होता है कि अवतारी सत्ता एक साथ बहुआयामी रूपों में प्रकट होती है एवं करोड़ों ही नहीं, पूरी वसुधा के उद्धार व चेतनात्मक धरातल पर सबके मनों का नये सिरे से निर्माण करने आती है। परम पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य को एक ऐसी ही सत्ता के रूप में देखा जा सकता है, जो युगों-युगों में गुरु एवं अवतारी सत्ता दोनों ही रूपों में हम सबके बीच प्रकट हुई। अस्सी वर्ष का जीवन जीकर एक विराट् ज्योति प्रज्ज्वलित कर वह सूक्ष्म ऋषि चेतना के साथ एकाकार हो गयी, जो आज युग परिवर्तन को सन्निकट लाने को प्रतिबद्ध है।
परम वंदनीया माताजी शक्ति का रूप थीं, जो कभी महाकाली, कभी माँ जानकी, कभी माँ शारदा एवं कभी माँ भगवती के रूप में शिव की कल्याणकारी सत्ता का साथ देने आती रही हैं। उन्होंने भी सूक्ष्म में विलीन हो स्वयं को अपने आराध्य के साथ एकाकार कर ज्योतिपुरुष का एक अंग स्वयं को बना लिया। आज दोनों सशरीर हमारे बीच नहीं हैं, किन्तु, नूतन सृष्टि कैसे ढाली गयी, कैसे मानव गढ़ने का साँचा बनाया गया है, इसे शांतिकुंज, ब्रह्मवर्चस, गायत्री तपोभूमि, अखण्ड ज्योति संस्थान एवं युगतीर्थ आँवलखेड़ा जैसी स्थापनाओं तथा संकल्पित सृजन सेनानीगणों के वीरभद्रों की करोड़ों से अधिक की संख्या के रूप में देखा जा सकता है।
"परम पूज्य गुरुदेव का वास्तविक मूल्यांकन तो कुछ वर्षों बाद इतिहासविद व लेखक करेंगे, किन्तु यदि उन्हें आज भी साक्षात् कोई देखना या उनसे साक्षात्कार करना चाहता हो तो उन्हें उनके द्वारा अपने हाथ से लिखे गये उस विराट् परिमाण में साहित्य के रूप में—युग संजीवनी के रूप में देखा जा सकता है, जो वे अपने वजन से अधिक भार के बराबर लिख गये।"
इस साहित्य में संवेदना का स्पर्श इस बारीकी से हुआ है कि लगता है लेखनी को उसी की स्याही में डुबाकर लिखा गया हो। हर शब्द ऐसा है जो हृदय को छूता है, और मनुष्य के मन व विचारों को बदलता चला जाता है। लाखों-करोड़ों के मनों के अंतःस्थल को छूकर इस साहित्य ने उनका कायाकल्प कर दिया। रूसो के प्रजातंत्र की और कार्लमार्क्स के साम्यवाद की क्रान्ति भी इसके समक्ष बौनी पड़ जाती है। उनके मात्र इस युगलेखक वाले स्वरूप को लिखने तक में लगता है कि एक विश्वकोश तैयार हो सकता है, फिर उस बहुआयामी रूप को जिसमें वे संगठनकर्ता, साधक, करोड़ों के अभिभावक, गायत्री महाविद्या के उद्धारक, संस्कार परम्परा का पुनर्जीवन करने वाले, ममत्व लुटाने वाले एक पिता, नारी जाति के प्रति अनन्य करुणा बिखेरकर उनके ही उद्धार के लिए धरातल पर चलने वाला नारी जागरण अभियान चलाते देखे जाते हैं, अपनी वाणी के उद्बोधन से एक विराट् गायत्री परिवार एकाकी अपने बलबूते खड़े करते दिखाई देते हैं।
बाल्यकाल एवं साधना
आश्विन कृष्ण त्रयोदशी विक्रमी संवत् 1968 (20 सितम्बर, 1911) को आँवलखेड़ा ग्राम (जनपद आगरा) में जन्मे श्रीराम शर्मा जी का बाल्यकाल व किशोर काल ग्रामीण परिसर में ही बीता। वे जन्मे तो थे एक संपन्न जमींदार घराने में, जहाँ उनके पिता श्री पं. रूपकिशोर जी शर्मा आस-पास के राजघरानों के राजपुरोहित, उद्भट विद्वान और श्रीमद्भागवत पुराण के प्रख्यात कथाकार थे, किन्तु श्रीराम जी का अंतःकरण मानव मात्र की पीड़ा से सतत विचलित रहता था।
साधना के प्रति उनका झुकाव बचपन में ही दिखाई देने लगा, जब वे अपने सहपाठियों और छोटे बच्चों को अमराइयों में बिठाकर स्कूली शिक्षा के साथ-साथ सुसंस्कारिता अपनाने वाली आत्मविद्या का शिक्षण दिया करते थे। छटपटाहट के कारण हिमालय की ओर भाग निकलने व पकड़े जाने पर उन्होंने संबंधियों को बताया कि हिमालय ही उनका घर है एवं वहीं वे जा रहे थे। जाति-पाँति का कोई भेद नहीं मानते हुए, उन्होंने तत्कालीन समाज की कुप्रथाओं का विरोध किया। जब गाँव की एक वृद्ध अछूत महिला को कुष्ठ रोग हो गया, तो उन्होंने उसकी झोपड़ी में जाकर सेवा की, जिसके कारण उन्हें परिवार का विरोध भी सहना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपना सेवा-व्रत नहीं छोड़ा। उन्होंने किशोरावस्था में ही समाज सुधार की रचनात्मक प्रवृत्तियाँ चलाना आरंभ कर दी थीं। वे चाहते थे कि जनमानस स्वावलंबी बने और राष्ट्र के प्रति उसका स्वाभिमान जागे। इस उद्देश्य से उन्होंने गाँव में ही एक बुनताघर स्थापित किया, जिसके माध्यम से स्थानीय युवाओं और नारी शक्ति को आत्मनिर्भर बनने की राह दिखाई।
गुरुसत्ता का साक्षात्कार एवं तीन संदेश
पंद्रह वर्ष की आयु में वसंत पंचमी की वेला में (सन् 1926) उनके घर की पूजास्थली में उनकी गुरुसत्ता का आगमन हुआ (अदृश्य छायाधारी सूक्ष्म रूप में)। यह वही पूजास्थली थी जहाँ वे नियमित रूप से गायत्री साधना करते थे, जिसकी दीक्षा उन्हें महामना पं. मदनमोहन मालवीय जी ने काशी में दी थी। गुरुसत्ता ने प्रज्ज्वलित दीपक की लौ में से स्वयं को प्रकट कर उन्हें विगत कई जन्मों के क्रियाकलापों का दिग्दर्शन कराया तथा दुर्गम हिमालय में साधना करने का निर्देश दिया। उन्होंने पूज्य गुरुदेव को तीन प्रमुख संदेश दिए:
- गायत्री पुरश्चरण: गायत्री महाशक्ति के चौबीस-चौबीस लाख जप के २४ महापुरश्चरणों का अनुष्ठान, जिसे जौ की रोटी और छाछ के कठोर तप के साथ पूरा करना था।
- अखण्ड घृतदीप: अखण्ड घृतदीप की स्थापना कर जन-जन तक ज्ञान का प्रकाश फैलाना, जो बाद में 1937 में अखण्ड ज्योति पत्रिका के प्रकाशन से होते हुए विचार-क्रान्ति अभियान के रूप में विश्वव्यापी बना।
- युगधर्म का निर्वाह: पुरश्चरणों के दौरान युगधर्म का निर्वाह करते हुए राष्ट्रहित के लिए स्वयं को खपाना, समय-समय पर हिमालय यात्रा करना तथा गुरुसत्ता के मार्गदर्शन में आगे बढ़ना।
स्वतंत्रता संग्राम एवं राष्ट्र सेवा
राष्ट्र के परावलम्बी होने की पीड़ा पूज्य गुरुदेव को निरंतर सताती थी। गुरुसत्ता ने उन्हें संकेत दिया कि "युगधर्म की महत्ता व समय की पुकार सुनकर तुम्हें अग्निकाण्ड में पानी लेकर दौड़ पड़ने की तरह देश सेवा के लिए आगे आना होगा।"
1927 से 1933 तक वे एक सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी रहे। घरवालों के विरोध के बावजूद पैदल चलकर वे आगरा के कांग्रेस प्रशिक्षण शिविर में पहुँचे। उन्हें छह-छह माह की कई बार जेल हुई। जेल में रहकर उन्होंने निरक्षर कैदियों को शिक्षित किया और स्वयं अंग्रेजी सीखी। आसनसोल जेल में वे पं. जवाहरलाल नेहरू की माता श्रीमती स्वरूपरानी नेहरू, श्री रफी अहमद किदवई, महामना मदनमोहन मालवीय जी और देवदास गाँधी जैसे राष्ट्रनायकों के साथ रहे।
नमक सत्याग्रह के दौरान अंग्रेजी सैनिकों द्वारा बर्बरतापूर्वक पीटे जाने पर भी उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज को नहीं छोड़ा। जब उनके हाथ से झंडा छीनने की कोशिश की गई, तो उन्होंने मुँह से झंडा दबा लिया और बेहोश हो गए। आजादी के प्रति उनके इसी जुनून के कारण उन्हें "श्रीराम मत्त" नाम मिला। लगानबन्दी आंदोलन के दौरान उन्होंने पूरे आगरा जिले का दौरा कर लगानबन्दी के प्रामाणिक आंकड़े एकत्र किए, जिन्हें महात्मा गाँधी के निर्देश पर ब्रिटिश पार्लियामेंट भेजा गया, जिसके आधार पर पूरे प्रान्त के लगान माफी के आदेश जारी हुए। स्वतंत्रता के बाद सरकार द्वारा दी जाने वाली सेनानी पेंशन को उन्होंने प्रधानमंत्री राहत कोष में समर्पित कर दिया।
विचार क्रांति एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण
आचार्य श्री ने वेद, उपनिषद, गीता, स्मृति, पुराण, योगसूत्र और ब्रह्मसूत्र आदि प्राचीन ग्रंथों का आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भाष्य किया। उनका मुख्य उद्देश्य आध्यात्मिकता को अंधविश्वास, पाखण्ड और रूढ़िवादी कर्मकांड से मुक्त करना तथा इसे व्यावहारिक, सामाजिक और लोकमंगलकारी बनाना था। उन्होंने गायत्री मंत्र को एक "वैज्ञानिक मंत्र" के रूप में प्रस्तुत कर यह सिद्ध किया कि यह मस्तिष्क की सुप्त ग्रंथियों को जाग्रत करने वाला बीज मंत्र है।
"समस्याएँ मनुष्य ने खड़ी की हैं, समाधान भी मनुष्य ही करेगा, लेकिन तब, जब वह विचारों में क्रांति लाएगा।" इसी उद्देश्य से चलाया गया **"विचार क्रांति अभियान"** केवल पुस्तकों और भाषणों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने लाखों लोगों के जीवन में सादगी, संयम और सेवा का बीजारोपण किया।
आचार्य श्री ने 3200 से अधिक पुस्तकों का लेखन किया। इस विशाल साहित्य (वाङ्मय) में जीवन के सभी पहलुओं को वैज्ञानिक व आध्यात्मिक दृष्टिकोण से समझाया गया है। उन्होंने शांतिकुंज हरिद्वार (1971), गायत्री तपोभूमि मथुरा, और ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान जैसी महान संस्थाओं की स्थापना की, जो आज युग निर्माण परिवार के वैचारिक स्तंभ हैं।