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गायत्री तीर्थ - शान्तिकुञ्ज

गायत्री तीर्थ - शान्तिकुञ्ज

साधना की प्रचण्ड ऊर्जा एवं विशुद्ध लोकमंगल की भावना के प्रभाव से शान्तिकुञ्ज ऐसी सिद्धभूमि है, जहाँ आने वाला हर व्यक्ति ऊर्जा, उमंग-उत्साह और सकारात्मक सोच से भर जाता है और अपने आपको बदला हुआ अनुभव करता है। करोड़ों लोगों के विशाल गायत्री परिवार का अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय शान्तिकुञ्ज, समाज में फैली अवांछनीयता को मिटाकर ‘मानव में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण’ के परम पवित्र लक्ष्य के प्रति समर्पित है।

शान्तिकुञ्ज की विशेषताएँ

ध्यान-साधना का उपयुक्त वातावरण

संस्थापक ऋषियुग्म का प्रचण्ड तप, निरंतर करोड़ों गायत्री महामंत्र जप एवं श्रद्धालुओं के यज्ञ की ऊर्जा से यह प्रभावशाली सिद्धभूमि बनी है। यहाँ आकर लोग अपने जीवन में सुनिश्चित परिवर्तन का अनुभव करते हैं और गहरे ध्यान में उतरते हैं।

व्यक्तित्व विकास एवं जीवन परिष्कार

जीवन का वास्तविक आनंद सद्गुणों को धारण करने और छिपी क्षमताओं को निखारने से मिलता है। शान्तिकुञ्ज की अनुशासित दिनचर्या साधकों को अपने जीवन को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का अनूठा अवसर प्रदान करती है।

शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य लाभ

सकारात्मक चिंतन, सादा जीवन, सुपाच्य आहार, गंगातट और हिमालय की प्रदूषण मुक्त वायु का समन्वय। अस्वस्थ लोगों के लिए यहाँ योग, यज्ञ, और दुर्लभ वनौषधियों द्वारा समग्र चिकित्सा परामर्श उपलब्ध है।

संस्कार परम्परा

पुंसवन, नामकरण, मुण्डन, यज्ञोपवीत, विवाह से लेकर वानप्रस्थ तक के सभी 12 प्रमुख हिन्दू धार्मिक संस्कार यहाँ अत्यंत वैज्ञानिक, वैदिक एवं प्रेरक ढंग से निःशुल्क कराए जाते हैं, जो मानवीय पुरुषार्थ को नई दिशा देते हैं।

तनाव मुक्ति एवं जीवन प्रबन्धन

पारिवारिक अशांति और जिम्मेदारियों के दबाव से घिरे आज के मनुष्य के लिए यहाँ जीवन प्रबंधन के ऐसे व्यावहारिक सूत्र सिखाए जाते हैं, जो व्यक्ति को तनावमुक्त, सुखी, संतुष्ट और आत्मसंतोष से भरा जीवन जीने में मदद करते हैं।

बच्चों में संस्कारों का विकास

पश्चिमी संस्कृति और मोबाइल/टीवी के कुप्रभावों से नई पीढ़ी को बचाना। आडंबर रहित आध्यात्मिक और पारिवारिक स्नेह का वातावरण बच्चों में आत्मबल, बड़ों के प्रति आदरभाव और राष्ट्र सेवा का संकल्प जाग्रत करता है।

जीवन साधना एवं प्रशिक्षण सत्र

शान्तिकुञ्ज की विशेषताओं का लाभ यहाँ नियमित रूप से चलने वाले निःशुल्क प्रशिक्षण सत्रों में भाग लेकर लिया जा सकता है।

९ दिवसीय संजीवनी साधना सत्र

हर माह की १ से ९, ११ से १९ एवं २१ से २९ तारीखों में

यह सत्र विशेष रूप से व्यक्तित्व परिष्कार और आंतरिक ऊर्जा के जागरण के लिए चलाया जाता है। इसमें साधक पूर्णतः अनुशासित वातावरण में रहकर तप, जप और साधना का अभ्यास करते हैं।

एक मासीय युगशिल्पी प्रशिक्षण सत्र

हर माह की १ से २९ तारीखों में

समाजसेवा के लिए आवश्यक योग्यता संवर्धन हेतु। इसमें लोक कल्याणकारी आंदोलनों को गति देने के लिए कार्यकर्ताओं को संगठनात्मक, संगीत, और रचनात्मक कौशल का गहन प्रशिक्षण दिया जाता है।

संस्थापक ऋषियुग्म

Pandit Shriram Sharma Acharya
पं. श्रीराम शर्मा
Vandneeya Mataji
माता भगवती देवी

संस्थापक ऋषियुग्म

वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य एवं परम वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा का जीवन विश्व के हर व्यक्ति के लिए अनुकरणीय है। उन्होंने जो कुछ कहा, उसे पहले स्वयं अपने जीवन में उतारा। उन्होंने वेदों का भाष्य ही नहीं किया, बल्कि उनकी ऋचाओं को जीकर समाज के समक्ष आदर्श प्रस्तुत किया है। सादगी भरा जीवन जीते हुए भी अध्यात्म की ऊंचाइयों को कैसे छुआ जा सकता है, उनका जीवन इसका जीवंत उदाहरण है।

उनका मूल मंत्र 'बोओ और काटो' का सिद्धांत रहा। उन्होंने अपना सब कुछ समाज सेवा में लगा दिया और बदले में समाज से भरपूर स्नेह-सहकार पाया। आज उनके इसी प्यार के वशीभूत होकर लाखों लोग इस सतयुगी संकल्प को साकार करने में लगे हैं।

ऋषि परम्परा का पुनर्जागरण

शान्तिकुञ्ज में पूज्य गुरुदेव एवं वन्दनीया माताजी द्वारा प्राचीन ऋषियों की युगानुकूल परम्पराओं का व्यावहारिक पुनर्जीवन किया गया है।

भागीरथ परम्परा

ज्ञानगंगा गायत्री का अवतरण: आध्यात्मिक चेतना के सरस स्रोत से जनमानस के परिष्कार की विश्वव्यापी योजना।

याज्ञवल्क्य परम्परा

यज्ञीय प्रेरणा एवं दिव्य ऊर्जा: यज्ञीय प्रेरणाओं एवं दिव्य ऊर्जा का अभिनव प्रयोग, जीवन जीने की कला का अभ्यास एवं प्रशिक्षण।

पातंजलि परम्परा

प्राण चेतना का जागरण: आसन, प्राणायाम, प्रज्ञा योग द्वारा प्राण चेतना का जागरण-अभिवर्धन तथा आसुरी वृत्तियों से संघर्ष की तैयारी।

चरक परम्परा

वनौषधि चिकित्सा: दुर्लभ वनौषधि चिकित्सा शोध एवं प्रशिक्षण का तंत्र, जिससे जीवनी शक्ति का संवर्धन होता है।

वशिष्ठ परम्परा

राजतंत्र मार्गदर्शन: धन्वन्तरी की प्रामाणिकता सिद्ध कर, समाज और राष्ट्र के मार्गदर्शन एवं नियमन का एक विशिष्ट प्रयोग।

परशुराम परम्परा

विचार क्रान्ति अभियान: क्रान्तिकारी विचारों का प्रचार कर समाज से निकृष्ट एवं संकीर्ण विचारों का उच्छेदन।

व्यास परम्परा

आर्ष वाङ्मय का सुगम हिन्दी भाष्य: लगभग ३२०० पुस्तकों का ऐतिहासिक सृजन कर भटकती हुई विश्व मानवता को सही दिशा निर्देश देना।

समाज निर्माण के रचनात्मक आन्दोलन

पर्यावरण संरक्षण (वृक्षगंगा)

विगत वर्षों में १ करोड़ से अधिक वृक्षों का रोपण कर उनका पुत्र एवं मित्र के समान संरक्षण किया गया है।

निर्मल गंगा जन अभियान

गंगा मैया एवं अन्य जीवनदायिनी नदियों की स्वच्छता और संरक्षण के लिए निरंतर चलाए जाने वाले अभियान।

आदर्श ग्राम योजना

गाँवों को स्वच्छ, स्वस्थ, शिक्षित, स्वावलम्बी बनाने और नशा-कुरीतियों से मुक्त करने का व्यापक अभियान।

आपदा प्रबंधन अभियान

राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय स्तर की भीषण आपदाओं में राहत और पुनर्वास कार्यों में अग्रणी योगदान देना।

नैतिक शिक्षा (ज्ञान परीक्षा)

विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों के संवर्धन के लिए भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा, जिसमें ५० लाख से अधिक बच्चे भाग लेते हैं।

ज्ञानगंगा (साहित्य प्रसार)

पुस्तक मेलों, ज्ञान रथों और झोला पुस्तकालयों के माध्यम से जन-जन तक ऋषियों के विचारों को पहुंचाना।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

नहीं, गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज में दीक्षा, यज्ञ, सभी १२ प्रकार के संस्कार, साधना सत्र एवं अन्य समस्त प्रशिक्षण सत्र पूर्णतः निःशुल्क संचालित किए जाते हैं। यहाँ आवास एवं भोजन की व्यवस्था भी निःशुल्क प्रदान की जाती है।

संजीवनी साधना सत्र व्यक्तित्व परिष्कार एवं आत्म-विकास के लिए चलाया जाने वाला ९ दिनों का शिविर है। यह हर माह की १ से ९, ११ से १९ और २१ से २९ तारीखों में चलता है। इसमें भाग लेने के लिए आपको शान्तिकुञ्ज से पूर्व अनुमति प्राप्त करनी होती है।

यहाँ नामकरण, मुण्डन, यज्ञोपवीत, विद्यारंभ, विवाह, श्राद्ध आदि जैसे १२ प्रमुख संस्कार पूरी तरह वैदिक एवं वैज्ञानिक पद्धति से कराए जाते हैं। संस्कार कराने के इच्छुक परिजन शान्तिकुञ्ज पहुँचकर वहाँ बने संस्कार विभाग में निःशुल्क पंजीकरण करा सकते हैं।

शान्तिकुञ्ज में प्राचीन भारत की ७ मुख्य ऋषि परम्पराओं (भागीरथ, याज्ञवल्क्य, पातंजलि, चरक, वशिष्ठ, परशुराम, और व्यास) को आधुनिक समाज की आवश्यकता के अनुरूप पुनर्जीवित किया गया है। यहाँ ज्ञानदान (गायत्री), यज्ञीय ऊर्जा, प्रज्ञा योग, वनौषधि चिकित्सा, और वाङ्मय लेखन (विचार क्रांति) के रूप में इन परम्पराओं का व्यावहारिक प्रशिक्षण और शोध कार्य निःशुल्क संचालित किया जाता है।
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