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स्नेह सलिला शक्ति स्वरूपा

माता भगवती देवी शर्मा

करोड़ों गायत्री परिजनों को अपनी वात्सल्यमयी छत्रछाया देने वाली परम वन्दनीया माताजी (१९२६ - १९९४) का संक्षिप्त जीवन वृत्त।

वंदनीया माताजी

वंदनीया माताजी

वात्सल्य और करुणा की प्रतिमूर्ति

वात्सल्यमयी चेतना का अवतरण

परम वन्दनीया माता भगवती देवी शर्मा जी का जीवन वात्सल्य, करुणा और निस्वार्थ प्रेम की जीवंत गाथा है। वे न केवल पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी की धर्मपत्नी थीं, बल्कि गायत्री परिवार के विराट संगठन को एक सूत्र में पिरोने वाली परम संरक्षक भी थीं।

पूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के बाद उन्होंने संपूर्ण गायत्री परिवार को एक वात्सल्यमयी माता और संरक्षक पिता के रूप में दिशा दी। उनके मार्गदर्शन में ही देव संस्कृति दिग्विजय अश्वमेध यज्ञ श्रृंखला जैसे ऐतिहासिक अभियानों का देश-विदेश में सफल संचालन हुआ।

जीवन यात्रा के मुख्य पड़ाव

१९२६

२० सितंबर १९२६ को उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में पिता श्री जसवंत राय एवं माता श्रीमती रामप्यारी शर्मा के यहाँ जन्म हुआ।

१९४५

विवाहोपरांत घीयामण्डी, मथुरा में आगमन। आश्रम व्यवस्था, प्रकाशन, और पत्राचार के कार्यों में आचार्य जी की समर्थ सहयोगी बनीं।

१९५३

मथुरा में गायत्री तपोभूमि की स्थापना के साथ ही वृहत्तर गायत्री परिवार को वात्सल्य भरे संरक्षण से एक सूत्र में बाँधने का कार्य शुरू किया।

१९५८

गायत्री तपोभूमि मथुरा में ऐतिहासिक १००८ कुण्डीय गायत्री महायज्ञ की भव्य व्यवस्था एवं शाखाओं के गठन में सक्रिय योगदान।

१९६०-६१

पूज्य आचार्य जी की अज्ञातवास व हिमालय यात्रा के दौरान आश्रम के संपूर्ण दायित्वों तथा अखण्ड ज्योति पत्रिका का कुशलतापूर्वक संचालन।

१९७१

मथुरा की व्यवस्था सहयोगियों को सौंपकर हरिद्वार में नवीन स्थापना (वर्तमान गायत्री तीर्थ शांतिकुंज) के लिए प्रस्थान किया।

१९७२

पूज्यवर गुरुदेव की तृतीय हिमालय यात्रा के दौरान नवनिर्मित शांतिकुंज आश्रम की संपूर्ण व्यवस्थाओं का सुचारु संचालन किया।

१९८४-८६

पूज्य गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना की अवधि में सहयोग दिया तथा शांतिकुंज मुख्यालय व गायत्री परिवार की देशव्यापी गतिविधियों का कुशल नेतृत्व किया।

१९९०

पूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के पश्चात संपूर्ण गायत्री परिवार को एक सूत्र में बांधे रखने तथा वात्सल्यमयी संरक्षक की भूमिका निभाई।

१९९०-९४

देव संस्कृति दिग्विजय अश्वमेध यज्ञ श्रृंखला का देश-विदेश में ऐतिहासिक संचालन कर लाखों लोगों में नव-ऊर्जा का संचार किया।

१९९४

१९ सितंबर १९९४ (भाद्रपद पूर्णिमा) को महाप्रयाण कर शांतिकुंज में भौतिक देह त्यागी और पूज्य गुरुदेव की सूक्ष्म प्राणचेतना में विलीन हो गईं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

परम वन्दनीया माताजी का जन्म २० सितंबर १९२६ को उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में एक धार्मिक पृष्ठभूमि वाले संभ्रांत परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री जसवंत राय एवं माता का नाम श्रीमती रामप्यारी शर्मा था।

माताजी का संपूर्ण जीवन वात्सल्य, स्नेह और ममता से ओतप्रोत था। वे शांतिकुंज आने वाले हर साधक को अपनी संतान मानकर वात्सल्य प्रदान करती थीं। वहीं दूसरी ओर, पूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के पश्चात उन्होंने संपूर्ण गायत्री परिवार के आध्यात्मिक नेतृत्व एवं संगठन संचालन की अद्भुत शक्ति प्रदर्शित की, इसलिए उन्हें "स्नेह सलिला शक्ति स्वरूपा" कहा जाता है।

पूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के बाद माताजी ने संपूर्ण विश्व में आध्यात्मिक जागृति फैलाने के लिए 'देव संस्कृति दिग्विजय अश्वमेध यज्ञ' श्रृंखला का शंखनाद किया। १९९२ से १९९४ के मध्य उनके ही सानिध्य एवं निर्देशन में देश-विदेश में भव्य अश्वमेध यज्ञ आयोजित किए गए, जिससे विचार क्रांति अभियान को एक नई दिशा और तीव्रता प्राप्त हुई।

माताजी ने १९ सितंबर १९९४ (भाद्रपद पूर्णिमा) को महाप्रयाण किया। उनका पावन स्मारक और समाधि स्थल 'गायत्री तीर्थ शांतिकुंज' हरिद्वार में पूज्य गुरुदेव की पावन सत्ता के निकट 'सजल श्रद्धा - निष्कलंक प्रज्ञा' के रूप में स्थापित है।
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